History - chaupalkhabar.com https://chaupalkhabar.com Mon, 29 Jul 2024 06:49:22 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.7.1 https://chaupalkhabar.com/wp-content/uploads/2024/08/cropped-Screenshot_2024-08-04-18-50-20-831_com.whatsapp-edit-32x32.jpg History - chaupalkhabar.com https://chaupalkhabar.com 32 32 अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस: बाघों के संरक्षण की ओर एक महत्वपूर्ण कदम । International Tiger Day: An important step towards tiger conservation https://chaupalkhabar.com/2024/07/29/international-tiger-day-an-important-step-towards-tiger-conservation/ https://chaupalkhabar.com/2024/07/29/international-tiger-day-an-important-step-towards-tiger-conservation/#respond Mon, 29 Jul 2024 06:49:22 +0000 https://chaupalkhabar.com/?p=4073 प्रत्येक वर्ष 29 जुलाई को दुनिया भर में अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस मनाया जाता है, जिसका मुख्य उद्देश्य बाघों के संरक्षण और प्रबंधन के प्रयासों को प्रोत्साहित करना है। इस दिवस की घोषणा 29 जुलाई, 2010 को सेंट पीटर्सबर्ग में की गई थी, जिससे टाइगर रेंज वाले देशों को एक मंच पर लाया जा सके।   …

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प्रत्येक वर्ष 29 जुलाई को दुनिया भर में अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस मनाया जाता है, जिसका मुख्य उद्देश्य बाघों के संरक्षण और प्रबंधन के प्रयासों को प्रोत्साहित करना है। इस दिवस की घोषणा 29 जुलाई, 2010 को सेंट पीटर्सबर्ग में की गई थी, जिससे टाइगर रेंज वाले देशों को एक मंच पर लाया जा सके।

 

बाघों की वर्तमान स्थिति:

अखिल भारतीय बाघ अनुमान, 2022 की सारांश रिपोर्ट के अनुसार, भारत में न्यूनतम 3,167 बाघ हैं, जो दुनिया के 70 प्रतिशत से अधिक जंगली बाघों का निवास है। नवीनतम गणना मॉडल के अनुसार, बाघों की आबादी की ऊपरी सीमा 3,925 और औसत संख्या 3,682 बाघ है। यह 6.1 प्रतिशत की सराहनीय वार्षिक वृद्धि दर को दर्शाता है।

 

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संरक्षण की दिशा में प्रारंभिक प्रयास:

भारत में 20वीं सदी के मध्य तक शिकार, पर्यावास की कमी और अन्य मानवीय गतिविधियों के कारण बाघों की आबादी में तेज़ी से गिरावट आई। 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात यह गिरावट और भी बढ़ गई। इस निराशाजनक प्रवृत्ति से चिंतित होकर भारतीय वन्यजीव बोर्ड (आईबीडब्ल्यूएल) ने जुलाई 1969 में नई दिल्ली में एक बैठक बुलाई, जिसमें बाघों सहित सभी जंगली बिल्लियों की खालों के निर्यात पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की गई।

 

 

टाइगर टास्क फोर्स और प्रोजेक्ट टाइगर का गठन:

बाघों के संरक्षण के महत्व को देखते हुए, आईबीडब्ल्यूएल की कार्यकारी समिति ने एक 11 सदस्यीय टास्क फोर्स का गठन किया, जिसने अगस्त 1972 में अपनी अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत की। 1 अप्रैल, 1973 को कॉर्बेट टाइगर रिजर्व में आधिकारिक तौर पर प्रोजेक्ट टाइगर लॉन्च किया गया। शुरुआती चरण में नौ बाघ रिजर्व शामिल थे:

  1. कॉर्बेट (उत्तर प्रदेश)
  2. पलामू (बिहार)
  3. सिमिलिपाल (उड़ीसा)
  4. सुंदरवन (पश्चिम बंगाल)
  5. मानस (असम)
  6. रणथंभौर (राजस्थान)
  7. कान्हा (मध्य प्रदेश)
  8. मेलघाट (महाराष्ट्र)
  9. बांदीपुर (मैसूर)

बाघों के संरक्षण की दिशा में वर्तमान पहल:

राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण, भारत सरकार द्वारा राज्य सरकारों के सहयोग से बाघों के संरक्षण की दिशा में अनेक अग्रणी पहल की गई हैं। इनमें बाघों के आवासों की सुरक्षा, शिकार पर प्रतिबंध, और जागरूकता कार्यक्रम शामिल हैं। इसके परिणामस्वरूप बाघों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

 

निष्कर्ष:

अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस का मुख्य उद्देश्य बाघों के संरक्षण के महत्व को उजागर करना और उनके भविष्य की सुरक्षा के लिए किए जा रहे प्रयासों के बारे में जागरूकता बढ़ाना है। भारत ने बाघों के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं और इस दिशा में प्रयास जारी रखने की आवश्यकता है ताकि बाघों की आबादी को सुरक्षित रखा जा सके।

 

By – Brajesh Kumar Gaurav 

 

https://youtu.be/tKFTkwacYCE

 

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) के स्थापना दिवस पर कर्मियों को दी शुभकामनाएं https://chaupalkhabar.com/2024/07/27/prime-minister-narendra-modi-greeted-the-central-reserve-police-force-crpf-personnel-on-their-foundation-day/ https://chaupalkhabar.com/2024/07/27/prime-minister-narendra-modi-greeted-the-central-reserve-police-force-crpf-personnel-on-their-foundation-day/#respond Sat, 27 Jul 2024 09:00:28 +0000 https://chaupalkhabar.com/?p=4056 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) के स्थापना दिवस के अवसर पर सभी कर्मियों को शुभकामनाएं दी हैं। उन्होंने अपने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पोस्ट में CRPF के कर्मियों की अटूट सेवा और समर्पण की सराहना की है। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, “स्थापना दिवस के अवसर पर, सभी @crpfindia कर्मियों को मेरी …

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) के स्थापना दिवस के अवसर पर सभी कर्मियों को शुभकामनाएं दी हैं। उन्होंने अपने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पोस्ट में CRPF के कर्मियों की अटूट सेवा और समर्पण की सराहना की है।

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प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, “स्थापना दिवस के अवसर पर, सभी @crpfindia कर्मियों को मेरी शुभकामनाएं। राष्ट्र के प्रति उनका अटूट समर्पण और अथक सेवा वास्तव में सराहनीय है। वे हमेशा साहस और प्रतिबद्धता के उच्चतम मानकों के पक्षधर रहे हैं। हमारे राष्ट्र को सुरक्षित रखने में उनकी भूमिका भी सर्वोपरि है।”

यह खबर भी पढ़ें : ‘PM नरेंद्र मोदी ने भारतीय खिलाड़ियों की प्रशंसा की, दी शुभकामनाएं, कहा हर खिलाड़ी देश का गौरव’

CRPF, जो भारत के सबसे बड़े केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों में से एक है, का स्थापना दिवस हर साल 27 जुलाई को मनाया जाता है। इस दिन को बल की बहादुरी, समर्पण और उनके द्वारा किए गए बलिदानों को मान्यता देने के रूप में देखा जाता है।

 

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प्रधानमंत्री मोदी के संदेश ने CRPF कर्मियों की सेवा और बलिदान की कद्र की है और उनकी भूमिका की महत्वपूर्णता को उजागर किया है। उनके शब्दों ने CRPF के सभी कर्मियों को प्रोत्साहित किया है और उनके द्वारा निभाई गई भूमिका की सराहना की है।

 

प्रधानमंत्री के इस बयान ने CRPF के स्थापना दिवस की भावना को और मजबूत किया है और भारतीय सेना और पुलिस बलों के बीच एकता और सहयोग की भावना को प्रोत्साहित किया है।

By – Brajesh Kumar Gaurav

 

 

 

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ज्ञानवापी मामले में मुस्लिम पक्ष को लगा झटका, हाईकोर्ट ने खारिज की याचिका….. https://chaupalkhabar.com/2024/02/26/%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%9e%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%aa%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a4%b2%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%b8%e0%a5%8d/ https://chaupalkhabar.com/2024/02/26/%e0%a4%9c%e0%a5%8d%e0%a4%9e%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%aa%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a4%b2%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%b8%e0%a5%8d/#respond Mon, 26 Feb 2024 08:00:08 +0000 https://chaupalkhabar.com/?p=2396 इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ज्ञानवापी मामले में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है, जिससे मुस्लिम पक्ष को झटका लगा है। अदालत ने व्यास तहखाने में हिंदू पक्ष के पूजा करने के अधिकार को बरकरार रखने का फ़ैसला लिया है। यह फैसला वाराणसी जिला अदालत के आदेश के बाद हुआ, जिसे मुस्लिम पक्ष ने हाईकोर्ट में चुनौती दी …

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ज्ञानवापी मामले में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है, जिससे मुस्लिम पक्ष को झटका लगा है। अदालत ने व्यास तहखाने में हिंदू पक्ष के पूजा करने के अधिकार को बरकरार रखने का फ़ैसला लिया है। यह फैसला वाराणसी जिला अदालत के आदेश के बाद हुआ, जिसे मुस्लिम पक्ष ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने मुस्लिम पक्ष की याचिका खारिज करते हुए हिंदू पक्ष को पूजा का अधिकार जारी रखने का आदेश दिया। इससे पहले वाराणसी जिला अदालत ने भी हिंदू पक्ष में फैसला सुनाया था, जिसके खिलाफ मुस्लिम पक्ष इलाहाबाद हाईकोर्ट की ओर गया था। हालांकि, यहां से भी मुस्लिम पक्ष को निराशा ही हाथ लगी और हाईकोर्ट ने ज्ञानवापी के व्यास तहखाने में हिंदू पक्ष की पूजा का अधिकार सुरक्षित रखा। ज्ञानव्यापी मस्जिद के सर्वे के बाद तहखाना खोल दिया गया था। इस मामले में शैलेंद्र कुमार पाठक ने वाद दायर किया था, जिसके बाद 31 जनवरी को जिला जज के आदेश पर हिंदू पक्ष को पूजा करने का अधिकार दे दिया गया था। जिला जज के आदेश के बाद काशी विश्वनाथ ट्रस्ट ने पूजा-अर्चना शुरू कर दी थी।

31 जनवरी को जिला जज के आदेश पर हिंदू पक्ष को व्यास तहखाने में पूजा करने का अधिकार दिया गया था

ज्ञानवापी तहखाने को लेकर विवाद की मूल कहानी यह है कि पूजा शुरू होने से पहले हिंदू पक्ष ने दावा किया था कि नवंबर 1993 से पहले व्यास तहखाने में पूजा-पाठ को उस वक्त की प्रदेश सरकार ने रुकवा दिया था, जिसको शुरू करने का पुनः अधिकार दिया जाए। मुस्लिम पक्ष ने प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट का हवाला देते हुए याचिका को खारिज करने की मांग की थी, लेकिन कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष की याचिका को अस्वीकार करते हुए हिंदू पक्ष को ज्ञानवापी के व्यास तहखाने में पूजा-पाठ का अधिकार दे दिया। मुस्लिम पक्ष का दावा था कि डीएम को वाराणसी कोर्ट ने रिसीवर नियुक्त किया है, जो पहले से काशी विश्वनाथ मंदिर के सदस्य हैं, इसलिए उनको नियुक्त नहीं किया जा सकता है। मुस्लिम पक्ष ने यह भी कहा था कि दस्तावेज में किसी तहखाने का जिक्र नहीं है और व्यासजी ने पहले ही पूजा का अधिकार ट्रस्ट को ट्रांसफर कर दिया था, इसलिए उन्हें अर्जी दाखिल करने का अधिकार नहीं है।

हाईकोर्ट ने हिंदू और मुस्लिम दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था। अंजुमन इंतजामिया कमेटी की तरफ से वाराणसी कोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें पूजा पर स्टे लगाने की बात कही गई थी। मुस्लिम पक्ष अब सुप्रीम कोर्ट जाने का विकल्प धरेगा। ज्ञानवापी मामले में हुए इस फैसले से सामाजिक विवाद की आग और बढ़ गई है। यह फैसला न केवल समाज में द्वंद्व उत्पन्न करता है, बल्कि धार्मिक सहिष्णुता और संविधानिक मूल्यों के संबंध में भी सवाल उठाता है। इस मामले की अगली सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में हो सकती है, जिससे यह विवाद और गहरा हो सकता है।

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जननायक कर्पूरी ठाकुर की 100वीं जन्म जयंती पर भारत सरकार ने मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित करने का निर्णय लिया https://chaupalkhabar.com/2024/01/24/on-the-100th-birth-anniversary-of-jannayak-karpuri-thakur-the-government-of-india-decided-to-posthumously-honor-him-with-bharat-ratna/ https://chaupalkhabar.com/2024/01/24/on-the-100th-birth-anniversary-of-jannayak-karpuri-thakur-the-government-of-india-decided-to-posthumously-honor-him-with-bharat-ratna/#respond Wed, 24 Jan 2024 10:37:37 +0000 https://chaupalkhabar.com/?p=2211 आज, बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री, जननायक कर्पूरी ठाकुर की 100वीं जन्म जयंती है, और देश ने इस महापुरुष को भारत सरकार ने मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित करने का निर्णय लिया है। उनकी स्वतंत्रता संग्राम में भागीदारी से लेकर, उनके सामाजिक-राजनीतिक करियर तक, कर्पूरी ठाकुर ने एक अद्वितीय प्रतिबद्धता और उदार दृष्टिकोण से भारतीय राजनीति …

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आज, बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री, जननायक कर्पूरी ठाकुर की 100वीं जन्म जयंती है, और देश ने इस महापुरुष को भारत सरकार ने मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित करने का निर्णय लिया है। उनकी स्वतंत्रता संग्राम में भागीदारी से लेकर, उनके सामाजिक-राजनीतिक करियर तक, कर्पूरी ठाकुर ने एक अद्वितीय प्रतिबद्धता और उदार दृष्टिकोण से भारतीय राजनीति को योगदान दिया। दिवंगत कर्पूरी ठाकुर अपने सागदीपूर्ण जीवन के कारण  समाज में जननायक के नाम से मशहूर थे।

 

Former Bihar CM Karpoori Thakur to be awarded Bharat Ratna posthumously

 

बिहार के गांव समस्तीपुर के पितौंझिया गांव में जन्मे, कर्पूरी ठाकुर ने नाई समुदाय के घर से होने के बावजूद अपने जीवन में एक सशक्त नेता बनने का संकल्प किया। उनके मूल से लेकर, उनका यात्रा पूरे देश के समाजवादी नेतृत्व की ओर एक प्रेरणा स्रोत बना। कर्पूरी ठाकुर को ‘सामाजिक न्याय का प्रतीक’ कहा गया है, और इसमें बहुत सत्ता और साहस का अभिवादन है कि एक ऐसे नेता ने कैसे अपने सामाजिक सुधार के लिए संघर्ष किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उन्हें सामाजिक न्याय के प्रतीक के रूप में सम्मानित किया है।

 

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उनका संघर्ष दिल्ली के छात्र जीवन से ही शुरू हो गया था, जब उन्होंने राष्ट्रवादी विचारों से प्रभावित होकर ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन में शामिल हो गए। उनकी राजनीतिक विचारधारा को लोहिया के विचारों से जोड़कर उन्होंने निचली जातियों के सशक्तिकरण के लिए प्रयास किया। 1970 के दशक में बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में, कर्पूरी ठाकुर ने समाज के वंचित वर्गों के लिए अभूतपूर्व कार्य किया। उनकी नेतृत्व में बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू हुई, जिससे समाज में बदलाव आया और लोगों को नई दिशा मिली। उन्होंने शिक्षा में भी कई सुधार किए, जैसे कि फीस में कमी और अंग्रेजी की अनिवार्यता को हटाना।

Former Bihar CM Karpoori Thakur to be conferred Bharat Ratna posthumously |  India News - The Indian Express

कर्पूरी ठाकुर का संघर्ष राजनीतिक धनबल और बाहुबल से भरपूर दौर में भी अद्वितीय था। उनके दौर के सियासी धरोहर के रूप में, उन्होंने आपत्ति और आपत्तिजनक बाहुबल के बावजूद एक ईमानदार और समर्थ मुख्यमंत्री के रूप में अपनी छाप छोड़ी।

कर्पूरी ठाकुर का जीवन एक अद्भुत उदाहरण है कि कैसे सामाजिक समरसता, न्याय और सशक्तिकरण के लिए समर्थ नेता देश को निरंतर प्रेरित कर सकता है। पीएम द्वारा कहा गया, की दलितों के उत्थान के लिए कर्पूरी ठाकुर की  अटूट प्रतिबद्धता और उनके दूरदर्शी नेतृत्व ने भारत के सामाजिक-राजनीतिक ताने-बाने पर एक अमिट छाप छोड़ी है जो उनके व्यक्तित्व को दर्शाती है।

 

By Neelam Singh.

 

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उद्घाटन समारोह में राम तो आएंगे लेकिन नहीं आएंगे “मुरली मनोहर जोशी और लालकृष्ण आडवाणी “ https://chaupalkhabar.com/2023/12/19/ram-will-come-but-will-not-attend-the-inauguration-ceremony-murli-manohar-joshi-and-lk-advani/ https://chaupalkhabar.com/2023/12/19/ram-will-come-but-will-not-attend-the-inauguration-ceremony-murli-manohar-joshi-and-lk-advani/#respond Tue, 19 Dec 2023 08:13:38 +0000 https://chaupalkhabar.com/?p=2030 मानवता के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण पल आने वाला है जब अयोध्या में राम मंदिर का उद्घाटन होने वाला है। 22 जनवरी, 2024 को प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी अपनी उपस्थिति से समारोह को सम्मानित करेंगे। प्राण प्रतिष्ठा समारोह से पहले, 22 जनवरी को, प्रधानमंत्री मोदी 11 बजे रामजन्मभूमि पर पहुंचेंगे और वहां भगवान रामलला की …

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मानवता के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण पल आने वाला है जब अयोध्या में राम मंदिर का उद्घाटन होने वाला है। 22 जनवरी, 2024 को प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी अपनी उपस्थिति से समारोह को सम्मानित करेंगे।

प्राण प्रतिष्ठा समारोह से पहले, 22 जनवरी को, प्रधानमंत्री मोदी 11 बजे रामजन्मभूमि पर पहुंचेंगे और वहां भगवान रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के लिए उपस्थित होंगे।

उद्घाटन के दूसरे दिन, 23 जनवरी से, जनता को भगवान राम के दर्शन का अवसर मिलेगा। प्राण-प्रतिष्ठा समारोह के साथ आयोजित मंडल पूजा और रामलला के दर्शन का आयोजन २४ जनवरी से होगा। यह समय होगा जब सभी धार्मिक प्राथनाओं के साथ भगवान राम के दर्शन का आनंद उठा सकेंगे। इस शानदार समारोह में उपस्थिति दर्शाने के लिए अयोध्या नगर निगम ने तैयारियों की शुरुआत की है। अयोध्या में श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए शौचालय और महिलाओं के लिए बदलते कमरे तैयार किए जा रहे हैं।

 

इस अवसर पर न केवल प्रधानमंत्री मोदी, बल्कि संघ के मुखिया मोहन भागवत, यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, राज्यपाल और मंदिर के ट्रस्टी भी उपस्थित होंगे। इसके साथ ही, कई महान व्यक्तित्व भी इस महोत्सव के गवाह बनेंगे। परन्तु ख़बर है की बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी प्राण-प्रतिष्ठा समारोह में शामिल नहीं होगे है यह ही दोनों ही BJP के वरिष्ठ नेता हैं जो स्वास्थ्य और उम्र संबंधी के कारणों से समारोह में हिस्सा नहीं ले पाएंगे। हालाँकि यह खबर सोचने वाली है क्योंकि दोनों ही नेताओं की बीजेपी की सरकार में एक महत्वपूर्ण भूमिका रही है मंदिर न्यास के परिसर ने सोमवार को दोनों वरिष्ठ नेताओं के संबंध पर यह जानकारी दी।

 

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प्राण-प्रतिष्ठा समारोह में शामिल होने की संभावना से बाहर रहने जा रहे वरिष्ठ नेताओं की अनुपस्थिति ने समारोह को थोड़ा सा शिष्ट बना सकता है, लेकिन इससे इस ऐतिहासिक घटना का महत्त्व कम नहीं होता। धार्मिक और सांस्कृतिक महापुरुषों के समारोह में शामिल होने से सभी को बड़ी ऊर्जा और शक्ति मिलती है।

 

इस समारोह में दलाई लामा, अमिताभ बच्चन, मुकेश अंबानी जैसे व्यक्तियों की उपस्थिति भारतीय समाज की विविधता और एकता को दर्शाती है। यह एक अवसर है जब धार्मिक गुरुओं से लेकर उद्योगपतियों तक सभी मिलकर एक महान उत्सव में शामिल हो रहे हैं।

मंदिर निर्माण के प्राण-प्रतिष्ठा समारोह में अयोध्या की धरती पर एक नया इतिहास रचने की घड़ी नजदीक आ रही है। यह समारोह एक महत्वपूर्ण पहलू है, जो भारतीय समाज के आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत को नई ऊँचाइयों तक ले जाने का प्रयास कर रहा है। इस बड़े समारोह की तैयारियों के बीच, खुशियों और उत्साह की लहरें हर तरफ छाई हुई हैं।

साथ ही, राम जन्मभूमि परिसर में राम कथा कुंज गलियारा का निर्माण भी किया जा रहा है। इस गलियारे में भगवान राम के जीवन के प्रमुख प्रसंगों को मूर्तियों के माध्यम से प्रस्तुत किया जाएगा। इस अनोखे समारोह में जोड़ी जा रही हर तरह की परंपराएं और संस्कृति की विविधता भारतीय समाज के साथ ही विश्व को भी दिखाएगी कि हमारी संस्कृति और धार्मिकता में एकता का विश्वास है।

इस ऐतिहासिक क्षण को और भी यादगार बनाने के लिए सभी तरह की सुविधाएं तैयार की जा रही हैं। मेहमानों के ठहरने के लिए विभिन्न स्थानों पर व्यवस्था की गई है। इस समारोह से न केवल धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से हमारे देश को एक नया परिचय मिलेगा, बल्कि यह एक महत्त्वपूर्ण संदेश भी देगा कि हम सभी मिलकर एक साथ चल सकते हैं और एकता में शक्ति है।

यह समारोह न केवल धार्मिक अर्थों में महत्त्वपूर्ण है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति और ऐतिहासिक विरासत की महत्ता को भी दर्शाता है। इस समारोह से देश के विभिन्न कोनों से आए लोगों को एक साथ लाने की बड़ी प्रयासरतता की जा रही है। इस प्रकार, यह समारोह एक बड़ा माध्यम बन रहा है जो सभी लोगों को एक साथ आने और देश के सांस्कृतिक धरोहर को समझने का अवसर दे रहा है। धार्मिक और सांस्कृतिक अनुभवों की यह महापर्व देश और समाज को नई ऊँचाइयों पर ले जाने का संकल्प लेकर आ रहा है।

 

 

 

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1971 के युद्ध में शहीद हुए वीर जवानों का दिन “विजय दिवस” https://chaupalkhabar.com/2023/12/16/vijay-diwas-the-day-of-the-brave-soldiers-martyred-in-the-1971-war/ https://chaupalkhabar.com/2023/12/16/vijay-diwas-the-day-of-the-brave-soldiers-martyred-in-the-1971-war/#respond Sat, 16 Dec 2023 09:15:23 +0000 https://chaupalkhabar.com/?p=2014 “विजय दिवस: 1971 के युद्ध के शौर्यपूर्ण अनुभवों को याद करते हुए देश ने विजय दिवस के अवसर पर देश के वीर जवानों के श्रद्धांजलि अर्पित की गयी।   भारतीय इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण दिन, विजय दिवस, देश भर में जोश, गर्व और श्रद्धांजलि के साथ मनाया गया। इस अवसर पर, वीर जवानों को श्रद्धांजलि …

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“विजय दिवस: 1971 के युद्ध के शौर्यपूर्ण अनुभवों को याद करते हुए देश ने विजय दिवस के अवसर पर देश के वीर जवानों के श्रद्धांजलि अर्पित की गयी।

 

भारतीय इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण दिन, विजय दिवस, देश भर में जोश, गर्व और श्रद्धांजलि के साथ मनाया गया। इस अवसर पर, वीर जवानों को श्रद्धांजलि अर्पित की गई, जो 1971 के भारत-पाक युद्ध में अपने शौर्य और बलिदान के साथ वीरता का परिचय दिया था।

 

विजय दिवस के अवसर पर, देश की सेना ने वीरता और समर्पण की मिसालों को याद किया। सेना की उत्तरी कमान के जनरल आफिसर कमांडिंग इन चीफ, लेफ्टिनेंट जनरल उपेन्द्र द्विवेदी ने बलिदानियों को सलामी अर्पित की, जिन्होंने अपने जीवन को देश की सेवा में समर्पित किया।

वर्ष 1971 के भारत-पाक युद्ध में भारतीय सेना ने दुश्मन को अपनी ताकत और तगड़ी जोरों से हराया था। इस विजय के अवसर पर, सेना ने दुश्मन के 93 हजार सैनिकों को आत्मसमर्पण करने पर मजबूर किया था। यह युद्ध न केवल विजय की घोषणा करता है, बल्कि वहाँ के वीर सैनिकों के शौर्य की कहानी भी सुनाता है।

जम्मू कश्मीर व लद्दाख में देश के दुश्मनों से लोहा लेने को हरदम तैयार सेना शनिवार को विजय दिवस पर 1971 की ऐतिहासिक जीत से प्रेरणा ली। प्रदेश में विजय दिवस के कार्यक्रमों में देश के लिए बलिदान देने वाले वीरों को श्रद्धांजलि दी गई ,ठीक 53 साल पहले वर्ष 1971 के भारत-पाक में सेना ने दुश्मन के 93 हजार सैनिकों को आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर कर दिया था।

 

आज भी सेना उच्च मनोबल के साथ पाक-चीन जैसे देशों द्वारा पैदा की जा रही सुरक्षा चुनौतियों का सामना करने के लिए कोई भी कीमत चुकाने को तैयार है। शनिवार को विजय दिवस पर सेना की उत्तरी कमान के जनरल ऑफिसर कमांडिंग इन चीफ लेफ्टिनेंट जनरल उपेन्द्र द्विवेदी बलिदानियों को सलामी दी। साथ ही कमान मुख्यालय के साथ सेना की चौदह, पंद्रह व सोलह कोर मुख्यालय के युद्ध स्मारकों में भी कार्यक्रम किए गए ।

 

सेना की पश्चिमी कमान की रायजिंग स्टार कोर की टाइगर डिवीजन भी शनिवार को विजय दिवस पर जम्मू में बलिदानियों को श्रद्धांजलि देगी। इस दौरान जम्मू शहर के बलिदान स्तंभ में टाइगर डिव के जीओसी मेजर जनरल गौरव गौतम बलिदानियों को पुष्प चक्र अर्पित किए गए ।इस कार्यक्रम में वर्ष 1971 के युद्ध में हिस्सा ले चुके जम्मू कश्मीर के कई पूर्व सैनिक भी हिस्सा लिया। प्रदेश में सेना ने वर्ष 1971 के युद्ध के नायकों को सम्मानित करने के लिए कई कार्यक्रमों का आयोजन किया था।

 

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जम्मू के दोमाना के साथ राजौरी के सुंदरबनी में आयोजित कार्यक्रम के दौरान सेना ने क्षेत्र के ललयाली में लड़ी गई लड़ाई के नायकों व बलिदानियों के परिजनों को सम्मानित किया। इसी प्रकार के कार्यक्रम गत दिनों लद्दाख के कारगिल जिले के द्रास में भी आयोजित किए गए। वर्ष 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध में जम्मू क्षेत्र के बसंतर व ललयाली इलाकों में भारतीय सेना ने दुश्मन को करारी मात देते हुए उसके दर्जनों टैंक कर पाकिस्तान के काफी हिस्से को अपने कब्जे में ले लिया था। इस लड़ाई में हिस्सा लेने वाले जम्मू के वीरों में परमवीर चक्र विजेता कैप्टन बाना सिंह, वीर चक्र विजेता कर्नल वीरेन्द्र साही व बलिदानी वीर चक्र विजेता लांस नायक मोहन लाल लखोत्रा शामिल थे।

कर्नल विरेन्द्र साही दुश्मन को खदेड़ते हुए गोलियां लगने से घायल हुए थे। वहीं वर्ष 1971 के युद्ध में जब पाकिस्तानी सेना ने कारगिल पर हमला किया था तो भारतीय सेना के वीर उस पर काल बनकर टूट पड़े थे। सेना की 18 पंजाब ने पाकिस्तान पर धावा बोलकर 36 घंटों के अंदर उसके कब्जे वाले 40 किलोमीटर इलाके व इसमें स्थित पाकिस्तान की 19 चौकियों को अपने कब्जे में ले लिया था। इस लड़ाई के दौरान सेना की 18 पंजाब के 29 बलिदानियों ने देश के लिए  बलिदान दिया था।

 

सेना ने विजय दिवस के अवसर पर शहीदों को याद किया, और उन्हें सम्मानित किया, जो देश की रक्षा के लिए अपनी जान की बाजी लगा दी थी। इस दिन को याद करते हुए, लोगों ने बलिदानियों को श्रद्धांजलि दी और उनके परिवारों के साथ खुशियों और गर्व के पलों को साझा किया।

 

विजय दिवस के उपलक्ष्य में अनेक कार्यक्रमों और समारोहों का आयोजन किया गया, जिनमें सेना के वीरों को सम्मानित किया गया और उनके साहसिक कार्यों को याद किया गया।

 

इस महान दिन पर, वीर सैनिकों के साहस, समर्पण, और बलिदान को याद करते हुए, देश ने एक और बार उनके त्याग और पराक्रम को सलामी अर्पित की। समस्त देशवासियों ने विजय दिवस को गौरवपूर्ण तरीके से मनाया और सेना के शौर्य को सराहा।

जवानो का त्याग, उनका समर्पण और पराक्रम हमारे देश की गरिमा को बढ़ाता है और हमें उनके प्रति आभार और सम्मान दिखाना चाहिए।

 

विजय दिवस के इस शुभ अवसर पर, हम सभी को एक साथ आकर देश के वीरों को सलामी देनी चाहिए, और उनके बलिदान और समर्पण को स्मरण करना चाहिए। इस दिन को याद करते हुए, हम सभी को वीर जवानों की श्रद्धांजलि देते हैं और उनके पराक्रम को सराहते हैं।

 

इस महान अवसर पर, हम सभी को देश के वीर सैनिकों को समर्पित श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं, जिन्होंने अपने जीवन को देश की सेवा में समर्पित किया। उनका समर्पण और बलिदान हमारे लिए एक महत्त्वपूर्ण उत्सव है, जो हमें हर समय गर्वान्वित करता है ।

 

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अनुच्छेद 370 सुप्रीम कोर्ट का आदेश कहा जम्मू-कश्मीर को मिले राज्य का दर्जा, 30 सितंबर 2024 तक चुनाव भी कराएँ जाए:- https://chaupalkhabar.com/2023/12/11/article-370-india-supreme-court-upholds-repeal-of-kashmirs-special-status/ https://chaupalkhabar.com/2023/12/11/article-370-india-supreme-court-upholds-repeal-of-kashmirs-special-status/#respond Mon, 11 Dec 2023 07:59:27 +0000 https://chaupalkhabar.com/?p=1945 महत्वपूर्ण न्यायिक फैसले ने भारतीय संविधान के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर के अनुच्छेद 370 को हटाने के संबंध में एक महत्त्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला दिया है। इस फैसले ने अनुच्छेद 370 को हटाने और जम्मू-कश्मीर को भारतीय संविधान के एक समान अंग के रूप में स्वीकार करने …

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महत्वपूर्ण न्यायिक फैसले ने भारतीय संविधान के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर के अनुच्छेद 370 को हटाने के संबंध में एक महत्त्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला दिया है। इस फैसले ने अनुच्छेद 370 को हटाने और जम्मू-कश्मीर को भारतीय संविधान के एक समान अंग के रूप में स्वीकार करने का संकेत दिया है।

 

अनुच्छेद 370 हटाने के चार साल बाद आज सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसले लेते हुए कहा कि अब इस पर चर्चा करना मुनासिब नहीं है। सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय बेंच ने अपने फैसले में कहा कि 5 अगस्त 2019 को केंद्र सरकार ने जो फैसला लिया था वो सही था और यह बरकरार रहेगा। सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने अपने फैसले में कहा कि जब जम्मू कश्मीर भारत का हिस्सा बना तभी से जम्मू कश्मीर की संप्रभुता खत्म हो गई थी। ऐसे में राष्ट्रपति के पास जम्मू कश्मीर को लेकर फैसला लेने का पूरा अधिकार है।

 

सुप्रीम कोर्ट के फैसले में यह बात साफ हो गई है कि जम्मू-कश्मीर का सम्मिलन भारतीय संविधान के साथ हो चुका है, और इसे अलग स्वतंत्र एकीकृत राज्य के रूप में देखने का समय अब गुजर चुका है। यह फैसला बहुत अहम है, क्योंकि यह जम्मू-कश्मीर के विकास और भारतीय संविधान के विश्वास को मजबूती से संदर्भित करता है।

 

इस फैसले के पहले, सुरक्षा कारणों से जम्मू-कश्मीर में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था। इंटरनेट सेवाएं और अन्य संचार के साधनों में संकट आ रहा था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद, जम्मू-कश्मीर के नागरिकों को एक नई उम्मीद की किरण मिली है।

 

फैसले में उठाई गई कई महत्त्वपूर्ण बातें हमारे संविधानिक संरचना को समझाती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने दर्शाया है कि अनुच्छेद 370 को हटाने के बाद जम्मू-कश्मीर को स्थायी रूप से भारत के एक हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए, और उसे भारतीय संविधान के तहत विकसित करने का पूरा अधिकार है।

 

सीजेआई ने यह भी कहा है कि चुनाव आयोग को जल्दी से जल्दी जम्मू-कश्मीर में चुनाव आयोजित करने के लिए कदम उठाना चाहिए। यह फैसला देश के लोकतंत्र के मजबूतीकरण की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है।

 

उन्होंने कहा कि हम चुनाव आयोग को सितंबर 2024 तक जम्मू-कश्मीर में चुनाव सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाने का निर्देश देते हैं। साथ ही सीजेआई ने कहा कि केंद्र के इस कथन के मद्देनजर कि जम्मू-कश्मीर को अपना राज्य का दर्जा फिर से मिलेगा, जम्मू-कश्मीर को दो केंद्रशासित प्रदेशों में पुनर्गठित करने की जरूरत नहीं थी।

 

अनुच्छेद 370 को निरस्त करने से पहले जम्मू-कश्मीर संविधान सभा की सिफारिश आवश्यक नहीं थी। 370 को हटाने का अधिकार जम्मू-कश्मीर के एकीकरण के लिए है। असाधारण परिस्थितियों को छोड़कर अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के राष्ट्रपति के फैसले के खिलाफ अपील में सुनवाई नहीं कर सकते। सीजेआई ने कहा कि दुर्भावनापूर्ण तरीके से इसे रद्द नहीं किया जा सकता।

 

इस फैसले से साफ होता है कि राष्ट्रपति को अनुच्छेद 370 को हटाने का अधिकार था और उसने इसे संविधानिक रूप से बदला। इससे जम्मू-कश्मीर को भारतीय संविधान के तहत संपूर्णता मिली है।

 

इस फैसले के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट ने देशवासियों को एक साथ मिलकर चलने और विकास की दिशा में कदम बढ़ाने की सलाह दी है। यह फैसला भारतीय संविधान की महत्ता और मान्यता को मजबूती से प्रतिष्ठित करता है।

 

अन्त में, इस न्यायिक फैसले ने देश को एक महत्त्वपूर्ण संदेश दिया है कि संविधान के माध्यम से समाज के सभी वर्गों को समानता, न्याय, और विकास का अधिकार है। इस नए युग के शुरुआती दिनों में, यह फैसला देश के भविष्य के लिए एक महत्त्वपूर्ण कदम है।

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लता मंगेशकर को उनकी जयंती पर पिएम मोदी ने किया याद, जानिए लता मंगेशकर से जुड़ी कुछ अनकही बातें https://chaupalkhabar.com/2023/09/28/prime-minister-narendra-modi-has-paid-tributes-to-lata-mangeshkar-on-her-birth-anniversary-know-the-factual-truth-about-lata-ji/ https://chaupalkhabar.com/2023/09/28/prime-minister-narendra-modi-has-paid-tributes-to-lata-mangeshkar-on-her-birth-anniversary-know-the-factual-truth-about-lata-ji/#respond Thu, 28 Sep 2023 07:36:55 +0000 https://chaupalkhabar.com/?p=1789   पीएम ने लता मंगेशकर को उनकी जयंती पर याद किया, प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने लता मंगेशकर को उनकी जयंती पर श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए एक्स पर थ्रेड पोस्ट करके लिखा की  “लता दीदी को उनकी जयंती पर याद कर रहा हूँ। भारतीय संगीत में उनका योगदान दशकों तक फैला है, जिसने एक चिरस्थायी …

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पीएम ने लता मंगेशकर को उनकी जयंती पर याद किया, प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने लता मंगेशकर को उनकी जयंती पर श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए एक्स पर थ्रेड पोस्ट करके लिखा की  “लता दीदी को उनकी जयंती पर याद कर रहा हूँ। भारतीय संगीत में उनका योगदान दशकों तक फैला है, जिसने एक चिरस्थायी प्रभाव पैदा किया है। उनकी भावपूर्ण प्रस्तुतियों ने गहरी भावनाएं पैदा कीं और हमारी संस्कृति में उनका हमेशा एक विशेष स्थान रहेगा।”

भारत की महान गायिका लता मंगेशकर सुरों की मल्लिका हैं। लता मंगेशकर अपनी आवाज के लिए हर जगह जानी जाती है। गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी लता जी का नाम दर्ज है। इन्होंने सबसे अधिक गाने गाकर एक रिकॉर्ड बनाया है। लता मंगेशकर ने 20 भाषाओं में 30 हजार से अधिक गाने गाए हैं।

 

अमेरिका के एक वैज्ञानिक ने कहा कि लता मंगेशकर की तरह की आवाज किसी गायक ने कभी नहीं सुनी है और भविष्य में भी नहीं सुनी जाएगी। लता जी को उनके मधुर आवाज के लिए शुरों की देवी कहा जाता है, और सभी गायक, चाहे वे नए हों या पुराने, उनके सम्मान में सिर झुकाते हैं।

 

कैसा रहा लता मंगेशकर का बचपन

 

लता मंगेशकर का जन्म 28 सितंबर 1929 को मध्यप्रदेश के इंदौर में हुआ था। उनके पिता का नाम दीनानाथ मंगेशकर था जो कि एक कुशल एवं योग्य रंगमंचीय गायक थे। दीनानाथ जी ने अपनी बेटी लता जी को तब से संगीत सिखाना शुरू किया, जब वे 5 वर्ष की थी। उनके साथ – साथ उनकी बहनें आशा, ऊषा और मीना भी संगीत सीखा करतीं थीं।

 

लता जी ने ‘अमान अली ख़ान साहिब’ और बाद में ‘अमानत ख़ान’ के साथ भी पढ़ाई की है। लता जी को शुरू से ही से संगीत में काफी रूची था और वह भगवान के द्वारा नवाजे गए संगीत का उन्होंने हमेंशा ही कद्र किया था, क्योंकी संगीत करियर समाप्त होने के बाद भी लता जी सुबह शाम रियाज करती थी। जानकारों का कहना है की, सुरूवाती दौर में भी उन्हें जो कुछ भी सिखाया जाता था वह जल्द ही सिख जाती थी। इन्हीं सब विशेषताओं के कारण उनकी इस प्रतिभा को बहुत जल्द ही एक अलग  और बेमिशाल पहचान मिल गई थी। हालांकी लता जी को सबसे पहले पाँच वर्ष की छोटी सी आयु में एक नाटक में अभिनय करने का अवसर मिला था।कहते हैं की लता जी के करियर की शुरुआत अवश्य अभिनय से हुई थी लेकिन लता जी की रूची तो हमेशा संगीत में ही थी।

 

जब 1942 में उनके पिता का निधन हो गया, लता मंगेशकर तब महज 13 वर्ष की थीं। लता मंगेशकर को उनके पिता की मृत्यु के बाद नवयुग चित्रपट फिल्म कंपनी के मालिक और उनके पिता के दोस्त मास्टर विनायक (विनायक दामोदर कर्नाटकी) ने संभाला, जिसने उन्हें एक कुशल गायिका और अभिनेत्री बनने में मदद की।

 

गायकी में करियर

 

हम सब जानते हैं की सफलता की राह कभी भी आसान नहीं होती। लता जी को भी संगीत की दुनिया में अपनी जगह बनाने में कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा था, भले ही उनकी आवाज बहुत अच्छी होती थी। आपको बता दें कि इनकी कमजोर आवाज़ के कारण पहले कई संगीतकारों ने इन्हें काम देने से मना कर दिया था। लता जी को उस समय की प्रसिद्ध पार्श्व गायिका नूरजहाँ से तुलना की जाती थी। लेकिन धीरे-धीरे अपनी प्रतिभा और लगन के बल पर उनको काम मिलने लगा। फिर लता जी की अद्भुत कामयाबी ने लता जी को फ़िल्मी जगत की सबसे मज़बूत महिला गायिका बना दिया था।

 

लता मंगेशकर जी को पुरे भारतीय फिल्म जगत में सर्वाधिक गीत रिकार्ड करने का भी गौरव प्राप्त है। फ़िल्मी गीतों के अतिरिक्त उन्होने ग़ैरफ़िल्मी गीत भी बहुत खूबी के साथ गाए हैं,  लता जी की आवाज से  ही यह झलकता है कि वो संगीत को कितना पूजती थी। उनकी प्रतिभा को सबसे पहले मुकाम मिली सन् 1947 में, जब फ़िल्म “आपकी सेवा में” उन्हें एक गीत गाने का मौक़ा मिला। इसके बाद तो लता जी को हर संगीतकार अपने संगीत के लिए कास्ट करना चहते थे, यही से ही उन्हे अपने करियर की पहली कामयाबी मिल गई, और उसके बाद एक के बाद एक बॉलीवुड के अलावा कई तरह के गीत गाने का मौक़ा मिला।

 

भारत को आजादी मिलने के बाद लता जी ने “ऐ मेरे वतन के लोगों” गीत गाया था जिसे सुनकर आज भी लोगों के आंखों में आंसु भर आते हैं। लता जी ने अपने साथ- साथ अपने बहनों का भी संगीत के क्षेत्र में करियर को दुनिया में सवारा है।

 

लता जी को मिले पुरस्कार 

लता मंगेशकर ने कई प्रतिष्ठित नागरिक सम्मानों और संगीत पुरस्कारों को प्राप्त किया है। इसमें लता जी को मिले प्रमुख पुरस्कारों और अलंकरणों की सूची है।

1969 में पद्म भूषण पुरस्कार,

1989 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार

राजीव गांधी सद्भावना पुरस्कार 1996

1999 में पद्म विभूषण और

2001 में भारत रत्न से सम्मानित

 

क्यों अविवाहित रही लता मंगेशकर

जिनकी आवाज की सारी दुनिया कायल है उस लता मंगेशकर ने ताउम्र शादी नहीं की। उन्होंने शादी क्यों नहीं की, इस बारे में स्वयं लता जी ने अपने कई साक्षात्कारों में कहा है कि उनके पिता के गुजर जाने के बाद सबसे बड़ी बेटी होने के कारण घर-परिवार चलाने की जिम्मेदारी उनके कंधो पर आ गई।लता जी कहती हैं की  उनके छोटे भाई-बहनों के बारे में सोचने में वो इतनी व्यस्त रहीं कि खुद की शादी के बारे में फैसला करने का उनको समय ही नहीं मिला।

  Brajesh Kumar

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जनसंघ के संस्थापकों में से एक पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती पर प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने श्रद्धांजलि अर्पित की ।। https://chaupalkhabar.com/2023/09/25/the-prime-minister-shri-narendra-modi-paid-tributes-to-pandit-deendayal-upadhyay-on-his-birth-anniversary/ https://chaupalkhabar.com/2023/09/25/the-prime-minister-shri-narendra-modi-paid-tributes-to-pandit-deendayal-upadhyay-on-his-birth-anniversary/#respond Mon, 25 Sep 2023 07:32:55 +0000 https://chaupalkhabar.com/?p=1718 प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय को उनकी जयंती पर श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि “अपना संपूर्ण जीवन मां भारती की सेवा में समर्पित करने वाले अंत्योदय के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय का व्यक्तित्व और कृतित्व देशवासियों के लिए सदैव प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।“   एक्स पर पोस्ट करते हुए पीएम …

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प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय को उनकी जयंती पर श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि “अपना संपूर्ण जीवन मां भारती की सेवा में समर्पित करने वाले अंत्योदय के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय का व्यक्तित्व और कृतित्व देशवासियों के लिए सदैव प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।“

 

एक्स पर पोस्ट करते हुए पीएम मोदी ने लिखा की ;

“ मां भारती की सेवा में जीवनपर्यंत समर्पित रहे अंत्योदय के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का व्यक्तित्व और कृतित्व देशवासियों के लिए हमेशा प्रेरणास्रोत बना रहेगा। उनकी जन्म-जयंती पर उन्हें मेरा सादर नमन।“

 

 

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना की, जिसका पहला महासचिव दीनदयाल उपाध्याय को बनाया गया। दिसंबर 1967 तक वे जनसंघ की महासचिव पद पर बने रहे। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने उनकी कार्यक्षमता, खुफिया गतिविधियों और परिपूर्णता के गुणों से प्रभावित होकर गर्व से सम्मानपूर्वक कहा, “यदि मेरे पास दो दीनदयाल हों, तो मैं भारत का राजनीतिक चेहरा बदल सकता हूँ।” परंतु 1953 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के अचानक निधन से जनसंध कि पुरी जिम्मेदारी दीनदयाल उपाध्याय को कंधो पर आ गइ, जिसके बाद पंडित दीन दयाल उपाध्याय ने बड़ी कुशलता से संगठन को संभाला। इस तरह, उन्होंने लगभग 15 वर्षों तक जनसंघ का महासचिव पद संभाला। दिसंबर 1967 में, दीनदयाल उपाध्याय को कालीकट में भारतीय जनसंघ के 14वें वार्षिक अधिवेशन में जनसंघ का अध्यक्ष चुना गया।

 

 

पंडित दीनदयाल उपाध्याय का जन्म 25 सितंबर 1916 को उत्तर प्रदेश के मथुरा जिला अंतर्गत नगला चंद्रभान नामक गाँव में हुआ था।  जब वे छोटे थे तब एक ज्योतिषी ने उनकी जन्मकुंडली देखकर यह भविष्यवाणी की थी कि वे महान विद्वान, विचारक, राजनेता और सेवाभावी होंगे, लेकिन वे विवाह नहीं करेंगे। 1934 में उनके भाई की बीमारी से अचानक मृत्यु हो गई जिस वजह से उनको गहरा आघात सहना पड़ा, उस समय दीनदयालजी बहुत छोटे थे। दीनदयाल उपाध्याय  ने अपनी हाई स्कूल की पढ़ाई राजस्थान के सीकर में पूरी की।शिक्षा में उत्कृष्टता के लिए बालक दीनदयाल को सीकर के तत्कालीन नरेश ने स्वर्ण पदक, किताबों के लिए 250 रुपये और दस रुपये की मासिक छात्रवृत्ति से सम्मानित किया था ।

 

पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने अपनी इंटरमीडिएट की परीक्षा पिलानी में विशेष योग्यता के साथ उत्तीर्ण की। उसके बाद में वह बी.ए. की पढ़ाई करने के लिए कानपूर गए, जहां वह सनातन कॉलेज में भर्ती हो गए। वह 1937 में अपने एक दोस्त श्री बलवंत महाशब्दे की प्रेरणा से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में शामिल हो गए। उसी वर्ष उन्होंने बी.ए. की परीक्षा भी प्रथम श्रेणी में पास किया था| जिसके बाद वे एम.ए. की पढ़ाई के लिए आगरा चले गए |

 

आगरा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में सेवा करते समय श्री नानाजी देशमुख और श्री भाउ जुगडे से उनका परिचय हुआ। उसी समय दीनदयाल उपाध्याय की बहन श्रीमती रमादेवी बीमार हो गईं और आगरा चली गईं। लेकिन दुर्भाग्यवश  उनकी मृत्यु हो गइ। दीनदयाल उपाध्याय के जीवन में यह दूसरा बड़ा झटका था। जिसके कारण वह एम.ए. की परीक्षा देने में असफल रहे और उनकी छात्रवृत्ति भी समाप्त हो गई।

 

जनसंघ के राष्ट्रजीवन दर्शन का निर्माण करने वाले दीनदयाल उपाध्याय ने स्वतंत्रता की पुनःस्थापना के प्रयासों के लिए पूरी तरह से भारतीय तत्व-दृष्टि देना चाहा था। एकात्म मानववाद जैसी प्रगतिशील विचारधारा को भारत को देते हुए, उन्होंने भारत की पुरानी सोच को बदल दिया। जनसंघ की आर्थिक नीति दीनदयालजी ने बनाई है। जनता का सुख या उनका विचार आर्थिक विकास का मुख्य लक्ष्य था।

विचार—स्वातंत्रय के इस युग में, मानव कल्याण के लिए कई विचारधारा का उदय हुआ है। इसमें अन्त्योदय, सर्वोदय, साम्यवाद और पूंजीवाद शामिल हैं। सनातन धर्म के जीवन-विज्ञान, जीवन-कला और जीवन-दर्शन ही मानव को पूर्णता की ओर ले जा सकते हैं।

 

“भारत में रहनेवाला और इसके प्रति ममत्व की भावना रखनेवाला मानव समूह एक जन हैं,” दीनदयाल उपाध्याय ने संस्कृतिनिष्ठा को राजनैतिक जीवनदर्शन का पहला स्रोत बताया। भारतीय संस्कृति उनकी जीवन शैली, कला, साहित्य और दर्शन से अलग नहीं है। इसलिए संस्कृति भारतीय राष्ट्रवाद का आधार है। भारत की एकता इसी संस्कृति पर निर्भर करेगी।“

 

पं. दीनदयाल (Pandit Deen Dayal Upadhyay) का 11 फरवरी, 1968 को रहस्यमय तरीके से मौत हो गई. मुगलसराय के रेल यार्ड में उनकी लाश मिलने से सारे देश में शोक की लहर दौड़ गई. जिसके बाद भारतीय जगसंघ के कार्यकार्ता और नेता अपने प्रिय नेता के खोने के बाद आनाथ हो गए. पार्टी को इस शोक से उबरने में बहुत समय लगा. क्योंकी उनकी इस तरह से हुई रहस्यमय हत्या को कई लोगों ने भारत के सबसे बुरे कांडों में से एक माना है.

 

Brajesh Kumar 

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रवींद्रनाथ टैगोर की पुण्यतिथि पर उनके महान विचारों को साझा करके उनकी स्मृति को स्मरण करें। https://chaupalkhabar.com/2023/08/07/death-anniversary-of-ravindra-nath-tagore-2023/ https://chaupalkhabar.com/2023/08/07/death-anniversary-of-ravindra-nath-tagore-2023/#respond Mon, 07 Aug 2023 07:59:47 +0000 https://chaupalkhabar.com/?p=1371 गुरुदेव नाम से प्रसिद्द “रवीन्द्रनाथ टैगोर” एक महान भारतीय कवि, लेखक, देशभक्त, दार्शनिक, मानवतावादी और चित्रकार थे। रवीन्द्रनाथ टैगोर भारत के सबसे प्रसिद्ध शख्सियतों में से एक एक है। इनका जन्म 7 मई 1861 को कलकत्ता के जोड़ासांको ठाकुरबाड़ी के एक अमीर सुसंस्कृत परिवार में हुआ था। वह अपने माता-पिता देवेन्द्रनाथ टैगोर (1817-1905) और सारदा …

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गुरुदेव नाम से प्रसिद्द “रवीन्द्रनाथ टैगोर” एक महान भारतीय कवि, लेखक, देशभक्त, दार्शनिक, मानवतावादी और चित्रकार थे। रवीन्द्रनाथ टैगोर भारत के सबसे प्रसिद्ध शख्सियतों में से एक एक है।

इनका जन्म 7 मई 1861 को कलकत्ता के जोड़ासांको ठाकुरबाड़ी के एक अमीर सुसंस्कृत परिवार में हुआ था। वह अपने माता-पिता देवेन्द्रनाथ टैगोर (1817-1905) और सारदा देवी (1830-1875) की संतान थे। वह तेरह बच्चों में सबसे छोटे थे और चौदह साल की उम्र में उन्होंने अपनी माँ को खो दिया था।

गंभीर यूरेमिया और अवरुद्ध मूत्राशय जेसी बिमारी के कारण 7 अगस्त 1941 को भारत ने उन्हें खो दिया और आज उनकी 82वीं पुण्य तिथि पर उनके जीवनशैली अथवा महान और प्रसिद्ध कामो को जानते हुए उन्हें याद करेंगे।

रवीन्द्रनाथ टैगोर की जीवनशैली, शिक्षा और उल्लेखनीय कार्य:

•रवीन्द्रनाथ की शिक्षा घर पर ही हुई थी,अनके पास कोई औपचारिक विश्वविद्यालय शिक्षा नहीं थी। लेकिन वह 17 साल की उम्र में इंग्लैंड चले गए।
• उन्होंने लंदन विश्वविद्यालय में दाखिला लिया लेकिन जल्द ही वह भारत लौट आये और अपनी आत्मसंगिनी मृणालिनी देवी से विवाह किया। उनका काव्य कैरियर काफी पहले शुरू हो गया था।
•उनका पहला गीत संग्रह ‘मानशी’ 1890 में प्रकाशित हुआ था। इसके बाद गीत के दो और संग्रह आए- ‘चित्रा’ और ‘सोनार तारि’।
• रवीन्द्रनाथ टैगोर ने शांतिनिकेतन, बीरभूम में विश्व भारती विश्वविद्यालय की स्थापना की लेकिन यह टैगोर के पिता देवेन्द्रनाथ टैगोर थे जिन्होंने शांतिनिकेतन का विचार सामने रखा था।
•शांति निकेतन एक प्रार्थना कक्ष था, जिसका नाम “मंदिर” था। इसे “पाठ भवन’ भी कहा जाता था जिसमें शुरुआत में केवल पाँच छात्र शामिल थे। गुरु-शिष्य की शिक्षण पद्धति का प्रयोग किया जाता था। शिक्षण की यह प्रवृत्ति आधुनिक शिक्षा प्रणाली के लिए लाभकारी देखी गई। इस बीच वह बहुत प्रसिद्ध हो गए और नोबेल पुरस्कार विजेता प्राप्त करने वाले वह पहले एशियाई भी थे। आज शांतिनिकेतन पश्चिम बंगाल का एक प्रसिद्ध विश्वविद्यालय शहर है।
• वह एक बंगाली बहुश्रुत व्यक्ति थे जिन्होंने कवि, लेखक, नाटककार, संगीतकार, दार्शनिक, समाज सुधारक और चित्रकार के रूप में इन क्षेत्रों में अद्वितीय योगदान दिया।
• उनकी प्रसिद्ध पुस्तकें चोखेर बाली, काबुलीवाला, घरे बाइरे, गोरा, द पोस्ट ऑफिस, गीतांजलि, द एस्ट्रोनॉमर आदि हैं।
• टैगोर भारत के सबसे प्रमुख क्रांतिकारियों में से एक थे और उन्हें “बंगाल के बार्ड” के रूप में जाना जाता है।
टैगोर ने 8 साल की उम्र में कविता लिखना शुरू किया और 16 साल की उम्र में छद्म नाम “भानुसिम्हा” के तहत अपना पहला संग्रह प्रकाशित किया।
• वह अपने कविता संग्रह ‘गीतांजलि’ के लिए वर्ष 1913 में साहित्य में नोबेल पुरस्कार जीतने वाले पहले गैर-यूरोपीय बने।
•टैगोर की रचनाओं का व्यापक रूप से अंग्रेजी, डच, जर्मन, स्पेनिश और अन्य यूरोपीय भाषाओं में अनुवाद किया गया।
• टैगोर ने दो देशों के लिए राष्ट्रगान की रचना की ; भारत के लिए: “जन गण मन” और दूसरा बांग्लादेश के लिए: “आमार शोनार बांग्ला”
•वह भाईचारे, प्रेम की शक्ति और शांति की अवधारणा में विश्वास करते थे। उनके लेखन का मुख्य उद्देश्य लोगों को बहुत करीब लाना था।
• टैगोर एक महान देशभक्त भी थे, उन्होंने भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन में भाग लिया।
• टैगोर को 1915 में सत्तारूढ़ ब्रिटिश सरकार द्वारा नाइटहुड से सम्मानित किया गया था। लेकिन उन्होंने 1919 में जलियांवाला बाग हत्याकांड के विरोध में नाइटहुड की उपाधि त्याग दी।
• उनके पूरे जीवन और लेखन में एक-दूसरे के प्रति प्रेम और सद्भाव स्पष्ट रूप से झलकता है। देश के प्रति उनकी प्रतिबद्धता स्पष्ट रूप से उद्धृत कथन में चित्रित की गई है, “मेरा देश जो हमेशा के लिए भारत है, मेरे पूर्वजों का देश, मेरे बच्चों का देश, मेरे देश ने मुझे जीवन और ताकत दी है।“ और फिर, “मैं फिर से भारत में जन्म लूंगा।“
• भारतीय अंग्रेजी साहित्य में टैगोर के प्रमुख योगदान में उनकी सबसे प्रमुख कृतियाँ जैसे चित्रा, नैवेद्य, सोनार तारि, कल्पना आदि शामिल हैं।
उनकी मृत्यु से पीड़ा की एक लंबी अवधि का अंत हो गया। उनकी मृत्यु जोरासांको हवेली में हुई, जहां वे पले-बढ़े थे। भले ही वह हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन वह आज भी हमारे दिलों में बने हुए हैं और अपने अविश्वसनीय कार्यों के माध्यम से हमेशा याद किए जाएंगे।

 

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